बेवकूफ बचपन

बेवकूफ बचपन
बचपन जिसे लोग कितना खुशनूमा पल समझते है पर यही पल हमें बेवकूफ बनाता है।
इन्सान जवान हो जाता है । अक्ल आ जाती है ।सोचने समझने की बुद्धि विकसित हो जाती है ।
मनुष्य समझदार हो जाता है ।
बड़े हो जाने के बाद हम "जात" "धर्म" "लिंग" और "समाज" की चिंता करने लगते हैं ।
हम जब जवान होने के राह पर होते है तो लोग हमें जाती का बोध करा देते है ।जिससे हम बचपन मे बिल्कुल अनजान थे । फिर हम लोगों को छोटी जाती, बड़ी जाती का दर्जा देने सीख जाते है ।
धर्म का ज्ञान हो जाता है । कोई हिन्दू कोई मुस्लिम कोई सिख कोई ईसाई , येह धर्म बड़ा है,  येह धर्म अच्छा नही है।
ब्राह्मण होने का गुरूर भी कम नही होता । धर्म के लिए लड़ाई की जाती है ।
छोटी सोच वाले लड़के लड़की के बीच भेद करने लगते हैं ।
हर वस्तु को समाज से जोड़कर देखा जाता है फिर फैसला लिया जाता है ।
और ये सब हमे जावान होने के साथ साथ सिखा दिया जाता है।
बचपन हमे अंधेरे में रखता है । तभी तो हम येह बहुमूल्य बातें बाद में जान पाते है । बचपन हमे इन सब बातों से दूर रखता है ।
हम  तो कहां जात देखे बिना दोस्ती कर लेते थे । बेवकूफ थे हम।
धर्म सिर्फ एक होता था दोस्ती का । बेवकूफ थे हम ।
लड़के लड़कियों में भेदभाव रखते नहीं थे । बस साफ दिल रखते थे और दोस्ती हो जाती थी । बेवकूफ थे हम ।
जो करना होता था बेधड़क कर देते थे । कभी सोचा नही कि लोग क्या कहेंगे, क्योंकि बेअकूफ थे हम ।
अक्ल तो अब जाके आयी है ।
बचपन मे तो बेवकूफ थे हम ।

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@Vikram

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