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Showing posts from March, 2018

ऐसी घटिया सोच को सलाम !!

1. वो कहते हैं की देश का विकास नहीं हो रहा। तो हमने कहा कि देश का विकास तो तभी होना न जब आप समय पर टैक्स दोगे। फिर जो उन्होंने मुँह फेरा की कहीं आस पास दिखाई नहीं दिए। और यह बदलाव की बातें करते हैं। 2. यह वही लोग हैं जो दीवार में कुत्तों की तरह मूतते हैं और अपने ही घर के बाहर पान चबाकर थूकते हैं फिर कहते हैं की इस देश में स्वस्छता नहीं रही। स्वस्छ भारत अभियान फेल हो गया। कोई अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाता इसके प्रति। और यह बदलाव की बात करते हैं। 3. बस में बैठे हैं। बगल में एक बूढी महिला सीट न होने पर उस व्यक्ति से सीट देने के लिए कह रही है पर यह हैं कि अपनी ही धून में अकड़ के बैठे हैं। पर बस में सीट की समस्या इनको तभी समझ में आती है जब खुद की माँ या बहन को कोई कहने पर भी सीट नहीं देता। और यह बदलाव की बात करते हैं। दूसरों के साथ भी वैसा व्यवहार करो जैसा तुम दूसरों से अपने लिए चाहते हो। 4. पहले उस पार्टी का गुड़गान करते नहीं थकते थे। चुनाव में उसी पार्टी को वोट भी दिया। पर जब उसी पार्टी ने धोका दिया तो कहते हैं की आजकल कोई भरोसे के लायक नहीं रहा। हमने कहा :- जब तुम्हे पहले से ही...

इन बैंकों में कुछ तो ख़ास है - भारतीय सरकारी बैंक !

सरकारी बैंक ! इनका क्या कहना।  इनके बारे में जितना भी कहो कम है। आज हम बताते हैं सरकारी बैंक के बारे कुछ दिलचस्प बातें जिससे आप रोज रूबरू होते ही हो।  1. इनकी सबसे बड़ी और सबसे प्रसिद्ध परेशानी (बहाना) - जी Server नहीं चल रहा! थोड़ी दे बाद आना। थोड़ी देर बाद जाने के बाद फिर बोलेंगे तो ऐसे गुस्सा होंगे जैसे उनके जायदाद के कागजों में उसका हस्ताक्षर मांग लिया हो।  2. इनसे गलती कभी नहीं होती - पासबुक में Barcode लगवाने गया तो उसने गलत खाते का Barcode लगा दिया। जब पासबुक एंट्री कराने गया हो हो नहीं रहा। दुबारा उनके पास गया और परेशानी बतायी तो बैंक वाले कहने लगे - देख नहीं सकते की Barcode गलत है। देखने चाहिए था तब।  अब वह  बेचारा  गरीब  करे क्या।  उसे पहली बात हो यही नहीं पता की Barcode   होता क्या है ? 3. लाइन में आओ - लाइन में लगा एक व्यक्ति गलती से आगे चला गया तो उसको ऐसे डांटेंगे जैसे लक्ष्मण रेखा पार कर ली हो और अगर उसी लाइन में कोई अपना जान पहचान का दिख जाए हो ऐसे आव भगत करेंगे जैसे की लाइन उनके लिए है ही नहीं। अलग से बुल...

प्रेम राग - भाग 3 !

1 वर्ष तक सब अच्छा ख़ासा चलता रहा पर वो घडी भी आयी जब दोनों को अलग होना पड़ा।   तबादला ! एक ऐसा शब्द जिसने दोनों को अलग कर दिया।   पिताजी का तबादला फिर से हो गया ! अब गायत्री को जाना था वहाँ से दूर।   कहाँ , किसी को कुछ नहीं पता।   1 वर्ष की सारी   यादें ओम के   आसपास घूमने लगीं।   वो सारे पल अचानक याद आने से ओम   कभी कभी रो पड़ता। कर कुछ नहीं सकते थे बस दिल में एक आस रहती थी की किसी तरह दुबारा मिल जाएँ और उन्ही पलों को दुबारा जियें। अंतिम बार वो गायत्री को और गायत्री उसको , दोनों एक दूसरे को दिल भर के देखना चाहते थे , एक दूसरे का चेहरा अपने जहन में उतारकर रखना चाहते थे। अब दूर जाने का समय था।   अंतिम बार दोनों गले मिले।   वो स्पर्श रोंगटे खड़े करनी वाली थी।   उसके बाद का हर दिन ओम को सुना सुना लगता था।   दुःखों भरे सारे गाने सुन लिए थे उसने , आते जाते बस उसी का ख़याल रहता था , पढ़ाई में ध्यान मुश्किल से ही लग पा रहा था।   दोस्त भी परेशान थे की कैसे इसका दुख काम करें।   यह पल भी कहाँ हमेशा...