हिंदी का हाल !!


हिंदी भाषा ! हमारी मातृभाषा ! पर क्या हम हिंदी को उतना महत्वा देते हैं जितनी इंग्लिश या अन्य भाषाओं को देते हैं।

हिंदी की हालत आजकल उन बाघों जैसी हो गयी हैं जिनका एक समय रौब था , शान थी पर आज वही ख़त्म होने की कगार पर है।

आज किसी को भी देख लो इंग्लिश में बोलता फिरता है। हिंदी तो सिर्फ नाम के लिए ही रह गयी है।
मतलब अगर आजकल किसी को इंग्लिश बोलनी आती है तो वो समझदार कहलाने लगता है चाहे वो कितना भी मूढ़ क्यों न हो पर अगर कहीं हमने हिंदी में दो  बोल क्या बोल दिए लोग तो हमे गवाँर समझने लगे। 

आजकल लोगों को किसी दूसरे के सामने हिंदी में बोलने में शर्म आती है।

कोई अगर इंग्लिश में बोल रहा हो तो उसके सामने इंग्लिश बोलने की कोशिश करेंगे चाहे इंग्लिश आती भी न हो।  क्यों ? क्यूंकि हमे अपनी मातृभाषा बोलने में शर्म आती है , घिन आती हैं की हम  ये कौन सी भाषा बोल रहें हैं।

आज माँ Mom हो गयी , पिता जी Dad हो गए। हिंदी के हर नाम का महत्वा इंग्लिश के शब्द आने से समाप्त हो गया।

एक घटना का जिक्र करना चाहूंगा :-

मैं एक कंप्यूटर की दुकान में गया , कुछ विश्वविध्यालय  के बच्चे अपना एडमिशन करवाने आये।  एक लड़का जिसे मै  निजी तौर पर जानता था वो भी वहाँ  आया।  उसे हिंदी में महारत हासिल थी।  स्कूली समय में उसने हिंदी विभाग से काफी पुरस्कार भी जीते थे। 

उसके दोस्तों ने हिंदी और इंग्लिश विषय  में से इंग्लिश का चयन किया।  अब परीक्षा थी उस लड़के की।  मुझे पता था वो हिंदी ही चुनेगा पर उसने इंग्लिश चुना।
 क्यों ?

क्यूंकि उसे लगा अगर उसने हिंदी ले ली तो उसके सारे दोस्त उससे अलग हो जाएंगे (मानसिक तौर पर) , हिंदी के नाम पर अब उसपे व्यंग्य होने लगेगा , चावल रुपी उस कॉलेज में वह कंकड़ रुपी मैल बनकर रह जाएगा। 

यही सोच आजकल सबकी है।  अंग्रेज हमपे जोर जबरदस्ती अधिकार नहीं जमा सके तो उन्होंने इंग्लिश थोप दिया और आज वही हो रहा है जैसा उन्होंने चाहा था। 

चीन, फ्रांस और जापान जैसे देशों ने अपनी भाषा के बलबूते पर विकास को अपनाया पर हमे आज अपनी भाषा बोलने पर शर्म का अनुभव होता है।

भला हो उन हिंदी कवियों और लेखकों का जिनके बलबूते आज हिंदी बची है नहीं तो यह कब की समाप्त हो चुकी होती।

मेरा निवेदन है उन हिंदी प्रेमियों से की कृपया ऐसे ही हिंदी का साथ दें , उसे फैलाएं और कभी इसे ख़त्म न होने दें।

धन्यवाद।  


इस Blog के माध्यम से हम अपना योगदान हिंदी के प्रति देते रहेंगे। बस आपके साथ की जरूरत है।

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