मात्रा नहीं संतुष्टि मायने रखती है !!
ज्यादा मिलने से
कुछ नहीं होता बल्कि थोड़े में भी जो
ज्यादा संतुष्टि मिलती है वो मायने रखती
है।
कहने को तो हम दो
रोटी (सिर्फ दो आटें के पेड़े) और थोड़ी सी सब्जी ही खाते हैं पर उससे मिलने वाली
संतुष्टी अपार होती है।
जिंदगी में
ज्यादा का इरादा करना बुरा नहीं है पर ज्यादा मिलने पर उसका कैसे इस्तेमाल करना है
वो महत्वपूर्ण है।
जब कोई चीज
ज्यादा मिले तो उसकी इज्जत कम हो जाती है , हम उसका दुरुपयोग करने लग जाते हैं या उसका असली मूल्य नहीं जान पाते पर जब
हमे कोई चीज कम मिलती है तो हम उसकी अहमियत जानते हैं और उसे सहेजकर रखते हैं।
चलिए एक उदहारण
देखते हैं ,
पहले 300 रूपए में 1 GB Data मिलने पर हम उसका सोच समझकर प्रयोग करते थे पर जैसे ही 300 रूपए में Unlimited मिलने लगा तो हम अब उसकी Value भूल रहे हैं।
ठीक है प्रयोग
करिये पर सावधानी पूर्वक और सही जगह पर व सही समय पर जिसमे आपका हित
हो पर दूसरों
को नुक्सान न पहुँचे।
एक बात तो जरूर
सुनी होगी "हर चीज की अति नुकसानदेह होती है" .
इसलिए जो है उसमे
संतुष्ट रहें और यदि अधिक मिल जाए तो उसका सावधानी पूर्वक उपयोग करें जिसमे सभी
भलाई निहित हो।
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