क्या आपका बेटा सच में शरीफ है ??
आजकल के बच्चे
जितने शरीफ अपने माता पिता के सामने होते हैं उतने ही कमीने माँ बाप के पीछे होते
हैं। सब जानते हैं की बच्चों का रवैया घर में देवता और बाहर शैतान जैसा होता हैं।
तो आज हम ऐसे ही कुछ उदाहरण लेकर आये हैं जो ऐसे बच्चों के बाते में कुछ मनोरंजक
बातें बताता है।
1. विदेशी फिल्म में
कुछ मसाला न हो तो क्या मज़ा। जब ऐसे बच्चे विदेशी फिल्म देख रहे होते हैं
तभी दो
घटनाएं भारत में घटती ही हैं - पहली कि उस फिल्म में मसालेदार दृश्य का आना (आप समझ
रहे होंगे में क्या कह रहा हूँ) और दूसरी तरफ उसी समय पिता जी का कमरे में प्रवेश।
अब क्या होगा?
तब बच्चा ऐसे शरीफ होने का तांडव करता हैं जैसे
उस फिल्म में तो वो भक्ति के दृश्य देख रहा हो। पिताजी के सामने कहेगा :
"आजकल फिल्मों में क्या क्या दिखाने लगे हैं। इससे बच्चों में क्या असर
पड़ेगा"। इतना कहकर वो टीवी बंद कर लेता हैं और पढ़ाई का ढोंग (पुराना पर
असरदार तरीका) करता हैं।
पिताजी के मन में ख़ुशी के फूल खिलने लगते हैं।
मेरा बेटा कितना शरीफ हैं! किसी की नज़र न लगे इसे।
पर....सच्चाई तो बाहर दोस्तोँ के सामने या घर में किसी के न होने पर पता
चलती हैं की तुम्हारा बेटा कितना शरीफ हैं। उस समय वो ऐसी ऐसी चीजें देखता हैं जो
तुम्हारी सोच के भी बाहर है (Single और Hostel में रहने वाले
लड़के मेरी बात को अच्छे से समझ सकते हैं)
2. वो बच्चा अब माँ
के साथ बाजार जा रहा है। गर्मी का मौसम और बाजार में छोटे छोटे कपडे पहनकर चल रही
लडकियां। सच कहता हूँ अगर किसी लड़के की सहनशक्ति का पता करना हो न तो यहाँ पर लड़के
बाज़ी मार लेंगे। अब लड़का किसी तरह अपनी माँ को देखता है जो उसी को देख रही होती
हैं। माँ कहती हैं "आजकल की लड़कियों को कोई लाज शर्म नहीं है " माँ सोच
रही होती है की मेरा बेटा कितना शरीफ है, लड़कियों की तरफ नज़र नहीं जाती उसकी! ओहो मेरा लाल !
अब लड़का करे क्या। वो शान्ति से नज़र निचे करके,
अपने मन की भावनाओं को दबाकर माँ के साथ खरीदारी करके घर चला आता हैं।
पर....2 मिनट बाद वही
लड़का माँ को यह कहता है की "माँ हम तो यह सामान लाना ही भूल गए" माँ
सोचती है की यह सामान छूट कैसे गया? (राज की बात यह है की वो चीज लिस्ट में थी ही नहीं) पर माँ सोचती है की मेरे
बेटे को जिम्मेदारी का भान हो गया है। इस बहाने से वो दुबारा बाजार जाता है।
पर सामन खरीदने नहीं सिर्फ उस भड़ास को निकालने
और अपनी आँखों को तृप्त करने जो माँ के रहते नहीं हो पाया। इस बार लड़का पूरी
प्रसन्नता के साथ घर जाता है। माँ को क्या पता की वही लाल बाद में अपने गाल लाल
लाल करने दुबारा गया होता है।
3. Group Study का भी अपना एक अलग टशन है। घर से कहकर निकलते
हैं की पढ़ने जा रहें है। माँ बाप अपने बेटे पर फक्र कर रहे होते हैं और सोचते हैं
की मेरा बेटा कितनी पढ़ाई कर रहा है। एक दिन यह पढ़ लिख कर बड़ा आदमी बनेगा। हमारा
नाम रौशन करेगा।
पर....असलियत में
होता कुछ और है। Group Study के नाम पर गया
लड़का Group
Party करके आता हैं। Group में लडकियां छेड़ता है, Group में शोर करता है, Group में दंगे करता है, Group में पीता है, Group में मूतता है , Group में खाता है, Group में हगता है, पर जिसके लिए गया था (वही Group Study नामक काल्पनिक कथा) वही नहीं करता।
4. "न जी न, मेरा बेटा और
गाली दे, हो ही नहीं सकता" ऐसे ही कुछ हास्यास्पद
बातें हर माँ अपने पडोसी से कहते हुए पायी जाती है।
बेटा भी माँ बाप के सामने ईश्वर की मूर्ति बनकर
रहता है। रिश्तेदारों के यहाँ जाना हो, कोई घर में आया
हो सबको नमस्ते कहता है। बड़ों के पैर छूता है और छोटों को प्यार करता है। कभी कभी
रिश्तेदार कह देते हैं "आपने तो ईश्वर का अवतार जन्म दिया है जी"
पडोसी ने कुछ काम दिया हो, बिना कुछ बोले शान्ति से कर देता है। पडोसी भी
उसकी शराफत का ढिंढोरा पिटने फिरते हैं।
पर.... इन्हे क्या पता
आजकल के बच्चों के बारे में। ये वो हैं जो अगर कोई हल्का सा भी धक्का दे दे तो
"फाड़ के रख दूंगा मैं तेरी" कहते हैं। और तो और उसके बाद माँ की, बहन की, बाप की, मामा की, मामी की, मौसी की, बुआ की, चाचा की, चची की, पूरे खानदान की गाली दे
देते हैं पर घर में शांति के संदेशवाहक और शराफत के पुजारी बन जाते हैं।
5. "दोनों भाई सदा मिलजुल कर रहते हैं। कभी लड़ाई
नहीं करते। सब चीजें एक दूसरे से बाँट कर खाते हैं। अपना अपना काम खुद करते हैं।
एक दूसरे की मदद करते हैं"-पड़ोस की आंटी कुछ ऐसा कहती हुई पाई गयीं आज मेरी
मम्मी पापा के सामने। पापा का सीना तो 56 इंच तक फूल गया, लगता की अब फट ही जाएगा। मम्मी भी दोनों हाथ
जोड़कर भगवान को धन्यवाद करने लगीं की उन्हें इतने अच्छे बेटे मिले। अब मम्मी का
रौब था मोहल्ले में अपने बेटों की शराफत की कहानी से।
पर....मानता हूँ की वो दोनों भाई के बारे में
ऊपर लिखी गयीं बातें सच हैं पर अंदर का किसको पता?
मिलजुल कर रहते हैं - घंटा ! (अपशब्द प्रयोग
करने के लिए खेद है ) पर जिनको सच्चाई पता हैं वो इसी शब्द का प्रयोग करता हैं !
कभी लड़ाई नहीं करते - फिर से घंटा ! घर के टेबल, कुर्सी, पलंग, आदि की रिपेयरिंग ऐसे ही नहीं होती की पड़े पड़े
टूट जाए।
सब चीजें एक दूसरे से बाँट कर खाते हैं। - एक
और बार घंटा ! बांटी तो सिर्फ लौकी की सब्ज़ी जाती है बाँकी चीजें तो छीनी और झपटी
जाती हैं।
अपना अपना काम खुद करते हैं। - घंटा ! घंटा !
घंटा ! घंटा ! हाथ से मुँह तक खाना नहीं ले जाय जाता और यह अपना काम खुद करेंगे।
एक दूसरे की मदद करते हैं - घंटा Cube ! ये तो बस यह सोचते रहते हैं की एक दूसरे का नुकसान कैसे किया जाए और ये मदद
करेंगे।
धन्यवाद।
ऊपर लिखी चीजें
थोड़ी अटपटी हैं पर हर किसी का हमारे जीवन में अपना अलग अलग महत्व हैं।
अतः पढ़ने के
लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद। अच्छी लगे तो
कृपया इसे शेयर करना न भूलें।
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