Some Changes Required in Schools - यह बदलाव जरूरी हैं!
आजकल के हालात को देखते हुए यह मेरे कुछ विचार है विद्यालय में कुछ बदलाव के बारे में, जिनसे मैं मानता हूँ कि बदलाव आ सकता है यदि इन उपायों को सही रूप से लागू किया जाए।
1. वातावरण - सर्वप्रथम, विद्यालय के वातावरण को बदलना होगा। एक अभिभावक सबसे पहले विद्यालय का वातावरण, रूप और सुंदरता देखता है तभी अगले आयाम तक पहुचता है, यदि उन्हें वातावरण ही अच्छा न लगे तो आगे की बात ही नही बढ़ती। अतः इसके लिए समय समय पर विद्यालय की मरम्मत, राग रोगन, सफाई, दीवारों में शैक्षिक विचारों व चित्रों का प्रदर्शन जैसे कार्यों को पूरा कर लेना चाहिए। विद्यालय सुंदर होगा तो बच्चों का भी पढ़ने में मन लगा रहेगा।
2. नैतिक शिक्षा - विद्यालय में पाठ्यपुस्तक के ज्ञान के अलावा दैनिक जीवन से जुड़ी शिक्षा भी प्रदान की जानी चाहिए। जैसे
दैनिक जीवन की परेशानियों का निपटान कैसे किया जाए, परेशानी के समय कैसे उस समस्या का समाधान किया जाए इत्यादि। इससे यह फायदा होगा कि विद्यार्थी पाठ्यपुस्तक के ज्ञान के आधार पर नैतिक शिक्षा को जीवन मे अपनाकर जीवन की परेशानियों का सामना आसानी से कर सकते हैं।
3. पढ़ाई में मनोरंजन - पढ़ाई को रोचक और मनोरंजक बनाना होगा। जिस विषय मे विद्यार्थी तेज है उसमे तो वो अच्छा प्रदर्शन जरूर करेगा परंतु कुछ विषय ऐसे भी होते हैं जिसमे छात्र को लगता है कि वो अच्छा कर लेगा पर पढ़ाने के समय उसमे रुचि नही ले पाता।
उदाहरण:- हमारे संस्कृत के शिक्षक का पढ़ाने का तरीका ही कुछ अलग था। आजकल के बच्चों को संस्कृत पढ़ना अच्छा लगता ही नहीं तो हमारे अध्यापक पढ़ाने के समय जब उन्हें लगता था कि बच्चे रुचि नही ले रहे तो वो बीच बीच मे कोई कहानी सुना देते थे, कभी खेल के लिए मैदान में ले जाते थे और कभी मनोरंजक तथ्य सुनाते थे। इससे हम दुबारा उत्साहित और जोश महसूस करते थे और पढ़ाई में मन लग जाता था।
यह तो केवल एक उदाहरण है। इसी तरह अन्य कईं उपाय हो सकते है जैसे:- बच्चों को विषय से संबंधित खेल खिलाना, वीडियो माध्यम से पढ़ाई, विषय को रोचक बनाने के लिए क्रियाकलाप आदि।
4. खेल कूद का महत्व - विद्यालय में केवल पढ़ाई ही नही बल्कि खेल कूद भी अत्यंत आवश्यक है। इससे बच्चों में उत्साह बढ़ेगा, तन, मन व मस्तिष्क में ऊर्जा का संचार होगा, शरीर मे रोगों से लड़ने की शक्ति का विकास होगा, साथ ही खेल में अपना भविष्य बनाने में भी सहायता मिलेगी।
5. सही और गलत स्पर्श का ज्ञान - बच्चों को अच्छे और गलत स्पर्श के बारे में अवगत कराना चाहिए। बड़े बच्चों (जैसे 8 कक्षा से अधिक कक्षा के बच्चे) को तो इसका भान हो जाता है कि कौन सा स्पर्श अच्छा है और कौन सा बुरा, परंतु छोटे बच्चे इस चीज को नही समझ पाते। अतः बचपन से ही विद्यार्थियों को इसका ज्ञान होना आवश्यक है।
जिए तरह आजकल बच्चों में अत्याचार हो रहे हैं उसे देखते हुए तो इस विषय को अनिवार्य रूप से कानून की तरह हर विद्यालय में नियमित विषय के रूप में शुरू कर देना चाहिए।
केवल बच्चों को ही नही बल्कि उनके अभिभावकों को भी इसकी जानकारी करवाना आवश्यक है, क्योंकि बच्चें सबसे अधिक अपने माता, पिता और परिवार से जुड़े होते हैं इसलिए परिवार के हर सदस्य का यह कर्तव्य बनता है कि वह बच्चों को इसकी शिक्षा घरेलू रूप में भी दें।
बच्चों से नियमित रूप से जानते रहना चाहिए कि आज वो किससे मिले, किसी ने उनके शरीर में स्पर्श तो नही किया यदि किया तो कहाँ। इससे फायदा होगा कि यदि कभी बच्चे के साथ किसी ने ऐसा करने की कोशिश की तो वो अपने परिवार के सदस्यों और अध्यापक को बात देगा/देगी फिर आरोपियों को पकड़ने में मुश्किल नही होगी। जो व्यक्ति ऐसा करता है उसे लिए कड़े से कड़े दंड का प्रावधान करना चाहिए। परंतु यह सब तभी संभव है जब विद्यालय में बच्चों को प्रारंभिक स्तर से ही इसकी शिक्षा दी जाए।
6. "बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ" -
पर कैसे ?
आजकल बेटियाँ बेटों से कईं ज्यादा आगे निकल रही है पर इसमें एक चीज आज भी खटकती है कि आज भी भारत मे कईं गाँवों में लोग बेटियों को पढ़ने नही भेजते, इसके कईं कारण हो सकते हैं। पर सवाल यहाँ उठता है कि आखिर उन अभिभावकों को कैसे समझाएं कि बेटियों को भी स्कूल जाने का हक़ है।
एक तो कानून बनाकर इसका समाधान किया जा सकता है और दूसरा उपाय है - सुविधाएं देकर।
जैसे लाडली जैसी योजना में हो रहा है, और मध्यान्ह भोजन योजना (Mid-Day Meal)। इसी प्रकार सरकार यह कानून बात दे कि जो परिवार अपनी बेटी को पढ़ने भेजेगा उस परिवार को सरकार की तरफ से सुविधाएं दी जाएंगी। वो सुविधाएं किसी भी रूप में हो सकती है। इससे गरीब माता पिता को अपनी बेटियों की चिंता करने की आवश्यकता नही रहेगी। इसके साथ ही वित्तीय और भोजन सजैसी सुविधाएं पाकर उनका ध्यान भी पढ़ने में लगा रहेगा और क्या पता कोई दूसरी कल्पना चावला, सायना नेहवाल निकल जाए इस मिट्टी से।
7. Sex Education - आजकल जिस प्रकार बच्चों पर अत्याचार बढ़ रहे हैं उसको मध्यनजर रखते हुए भारत मे Sex Education
को अनिवार्य कर देना चाहिए क्योंकि कोई भी व्यक्ति ऐसे जघन्य अपराध तभी करता है जब उसे उस चीज की जानकारी ठीक से नही होती। भारत की एक बड़ी विडंबना है, Sex शब्द सुनते है लोग ऐसे चेहरे बनाते हैं कि जैसे पता नही क्या सुन लिया हो।
लोगों की इसी सोच को बदलने के लिए बच्चों को इसके बारे में ज्ञान देना जरूरी है। Rape की अधिकतर घटनाएं वहां हुईं हैं जहां लोग कम शिक्षित या अशिक्षित हैं, क्योंकि वो क्या कर रहें हैं उनका उन्हें भान नही है, बस एक घिनौनी सोच है जिसके चपेट में मासूम बच्चीयां आ रही हैं। खाली और अशिक्षित दिमाग में शैतान का वास होता है, यदि हम ऐसा नही होने देना चाहते तो हमे घर से ही शुरुआत करनी चाहिए, अपने बच्चों को बिना शर्म महसूस किए Sex Education का ज्ञान देना चाहिए ताकि भविष्य में जाकर वो ऐसे अपराध न करें। Sex Education लागू करने से फायदा यह होगा कि व्यक्ति को सही और गलत का भान हो जाएगा जिससे वो ऐसे अपराध नही करेगा।
बच्चों में Sex के प्रति एक सकारात्मक सोच का विकास करना होगा।
सरकार 8 कक्षा के बाद ही Sex Education पढ़ाना शुरू कर देती है पर कितना ????
केवल 1 अध्याय। इसका फायदा क्या !! नुकसान और हो जाता है कि अपुर्ण शिक्षा बच्चों को अपराधी बना देती है। बाकी देशों में ऐसी घटनाएं नही होती , क्यों !!
क्योंकि वहां बच्चों को पूर्ण शिक्षा दी जाती है इसके बारे में, वहां के कानून मजबूत है, कम से कम कोई विधयाक तो सरकार नही चलाता।
पर सवाल यह उठता है कैसे ? शिक्षा कैसे प्रदान की जाए।
बच्चों को 8 कक्षा के बाद सैद्धांतिक ज्ञान के साथ साथ व्यवहारिक ज्ञान भी प्रदान करना चाहिए। नियमित पढ़ाई, समय समय पर परीक्षा और विद्यार्थी का व्यवहार निरीक्षण कुछ उपाय हैं जिससे बच्चों को Sex Education प्रभावी रूप से प्रदान करवाया जा सकता है
8. समानता - समानता तब आती है जब लड़के और लड़कियों के साथ समानता का व्यवहार किया जाए।
एक लड़का जो बचपन से लड़कों के स्कूल में पढ़ा, कॉलेज भी वहां जहाँ कोई स्त्री का साया नही। यहाँ तक कि परीक्षा भी लड़कों के अलग सेन्टर में और लड़कियों के अलग में। ऐसे में सरकार कहती है कि हम लड़के हो या लड़की सबको समान रूप से देखते हैं।
इससे नुकसान यह हो जाता है कि बच्चों के मन मे दूसरे लिंग के बारे में मन गढ़न्त विचारों का जन्म हो जाता है तो दोनों के बीच मे फासले बढा देती हैं।
बच्चे एक दूसरे को तभी समझ पायेंगे जब एक दूसरे के विचारों ला आदान-प्रदान कर पाएंगे तभी कईं मानसिकताओं का अंत हो पायेगा।
निष्कर्ष यह निकलता है कि - यदि आप सच मे लड़के और लड़कियों में समानता देखते हो तो उनको समानता का हक़ देना भी सीखो।
...............#MyGov
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