Yoga - The Art of Living and Science - योग - जीवन जीने की कला और विज्ञान !
योग - जीवन जीने की कला और विज्ञान!
योग!

सिर्फ एक शब्द नहीं अपितु एक मार्ग है स्वयं को स्वस्थ रखने और परमात्मा से स्वयं को जोड़ने का।
बचपन में अध्यापक विद्यालय में कहते थे-योग का अर्थ है आत्मा को परमात्मा से जोड़ना परन्तु उस समय इसका अर्थ कदापि समझ नहीं आया परन्तु इसे आजमाने और इसे स्वयं में ढालने के पश्चात अब इसका अर्थ समझ आया।
परन्तु अब इसके अर्थ में एक और सूत्र जुड़ गया और वो है:- योग-जीवन जीने की कला और विज्ञान!
फिर से आज कईं लोग असमंजस में हैं कि आखिर "योग - जीवन जीने की कला और विज्ञान" कैसे है ?
चलिए जानते हैं कैसे !
परन्तु आगे बढ़ने से पहले आपको यह समझना होगा की इसका अर्थ आपको तभी समझ आएगा यदि आप इसे अपने जीवन में अपनाएंगे। केवल पुस्तक में पढ़े अनुसार सिर्फ समझने से कुछ नहीं होगा बल्कि इसे अपने निजी जीवन में आजमाना अत्यंत आवश्यक है।

योग-जीवन की कला!
हम सब दिन प्रतिदिन अनेक कार्यों में संलग्न होते हैं। हर व्यक्ति किसी न किसी कार्य/कला में माहिर होता है। कोई अच्छा डॉक्टर होता है तो कोई अच्छा इंजीनियर। उसी प्रकार योग भी जीवन की एक कला है। जिस प्रकार हम अपने निजी जीवन में अनेक क्रियाकलाप करते हैं उसी प्रकार योग में भी काफी विविधताएं पाई जातीं हैं। योग केवल आसान का समुह ही नहीं बल्कि यह मेल हैं आसन, ध्यान, कर्म, शुद्धि, अष्टांग योग समुह (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि) इत्यादि।
इन सभी कर्मों में जीवन की कला झलकती है। योग में आपको कुछ अलग नहीं मिलेगा, यह आपके दैनिक जीवन जीने की कला का एक अंग है परन्तु इससे आपको एक नए अपूर्व अनुभव का एहसास होगा। यही है योग का अनूठापन।
अतः योग जीवन के हर अंग से जुड़ी है। यह आपके जीवन जीने की कला का अभिन्न अंग है इसलिए योग को जीवन जीने की कला कहा गया है।

योग - विज्ञान !
विज्ञान की एक विशेषता है - यह सर्वमान्य है ।
उसी प्रकार अब तो अंतराष्ट्रीय स्तर पर भी योग के फायदों को माना जा चुका है।
योग की ताकत को विज्ञान से तुलना की जाती हैं जिसमे वैज्ञानिक भी इसे मान चुके हैं की योग सर्वमान्य है और इसका स्वयं अनुशरण करते हैं।
एक बात जो योग को सबसे भिन्न बनाती है - विज्ञान के नुकसान होते हैं परन्तु योग कभी नुकसान नहीं करती।
योग एक विज्ञान है परन्तु इसे समझने के लिए वैज्ञानिक के दिमाग की आवश्यकता नहीं अपितु इसे स्वयं से ही समझा जा सकता है बस जरूरत है तो एक पहल की, अपने आप से। ऐसी कईं बीमारियों का इलाज विज्ञान नहीं कर पाता परन्तु योग से यह सहजता से संभव हो पाता है। इससे बड़ा और क्या उदहारण चाहिए योग को विज्ञान के सामान बताने के लिए। अतः योग भी विज्ञान का ही एक अंग है।
अब आते हैं योग के विकास पर। सर्वप्रथम आभार भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी का जो योग को एक देश के स्तर से उठाकर वैश्विक स्तर पर ले आये। यह कदम मानवता के विकास की तरफ एक उभरता कदम है और हमारे देश का सम्मान जिससे आज हम विश्व में योग से पहचाने जा रहे हैं।
योग का विकास मानवता के उत्थान में बहुत महत्वपूर्ण साबित होगा।

"योग से निरोग" यह कहावत सच होगा तो देश में जीवन प्रत्याशा दर में इजाफा होगा, स्वस्थ शरीर व स्वस्छ मन का विकास होगा, जीवन जीने के स्तर में बढ़ोत्तरी और निरोग देश का जन्म होगा।
अंत में यही कहना है:- योग को जीवन जीने की कला का हिस्सा बनाकर इसके विज्ञान से भी बढ़कर होने वाले लाभों को अनुभव करें।
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