The Combination of Greed and Religion - धर्म और लालच का संगम !

कल तक जहां मासूम जानवरों की निर्ममता से हत्या करके उनका मांस बड़े शान से बेचा जाता था आज वहीँ पर, उसी दूकान के समक्ष माता की मूर्ति लगाईं गई है।
धर्म से पुण्य कमाने को व्यक्ति तीर्थ जाता है परन्तु यह कभी समझ नहीं पाता की जिस तीर्थ का फल माता ने बेटी के रूप में घर में भेजा था उसे जन्म से पहले ही माता को सौप दिया गया है।
पूरे वर्ष घर की हालत कूड़ेदान से कम नहीं होती पर दिवाली आने के 2 हफ्ते पहले से ही केवल माता को प्रसन्न करने के लिए, धन की लालच सफाई करने में विवश कर देती है।
आजकल ईश्वर की पूजा, प्रार्थना और आराधना केवल डर और लालच की पूर्ती के लिए किये जाते हैं।
सच कहा जाए तो मनुष्य के कभी भी भक्ति के असली स्वरुप को नहीं जाना (मैंने भी नहीं)
बचपन में भगवान् की आराधना की क्यूंकि विद्यालय में पास होने और ज्यादा से ज्यादा अंक लाने की होड़ थी। यहां भी अपना लालच ही देखा। पर पास होने के बाद भी एक बार ईश्वर को याद नहीं किया।
बड़े हुए तो नौकरी पाने के लिए फिर से भगवन के सामने लेट गये। व्यापर अच्छा हो गया, नौकरी भी मिल गयी पर फिर भी एक बार भी ईश्वर को याद नहीं किया।
अब मृत्यु नज़दीक आ गयी। फिर अब दान धर्म, तीर्थ करने लगे। जो कभी मंदिर की सीढ़ियां तक नहीं चढ़ा आज वो दान धर्म और तीर्थ यात्रा कर रहा है। इसके पीछे भी एक लालच ही है ताकि मरने के पश्चात स्वर्ग की प्राप्ति हो।
हर जगह धर्म के नाम पर ढोंग किया जा रहा है। और तो और आजकल इसे ही सच्ची आस्था का नाम दिया जाता है।
ईश्वर ने कभी यह नहीं कहा की मनुष्य को छोड़ के मेरी चाकरी कर। पर मनुष्य ने भूखे की थाली का निवाला छीनकर उस पत्थर की मूर्ती को देना उचित समझा।
इस धरा में ईश्वर किसी भी रूप में आपके समक्ष आ सकता है, वह सुख में भी आता है और दुःख में तो हमेशा आपके साथ रहता है।
तो प्रश्न यह उठता है की आखिर कैसे पहचाने की भगवन किस रूप में है?
उत्तर यह है:- जब भी आपको लगे की आप कष्ट में हैं तो उस क्षण जो आपको संभाले, जो आपके परेशानी का हल दे और जो आपको आपकी परेशानी से निकलने में अपनी पूरी ताकत लगा दे उसी रूप में भगवान् आपके पास आता है।
ईश्वर भी उसी की मदद करता है जो अच्छे कर्म को महत्व देता है न की आस्था और धर्म का आडम्बर करे।
अतः झूठे धर्म का आडम्बर, झूठी आस्था और ईश्वर के प्रति लालच के भाव को छोड़ कर थोड़े अच्छे कर्म को बढ़ावा दिया जाए तो मानवता धन्य हो जायेगी।
धर्म के नाम पर व्यापर किया जा रहा है।
राम - रहीम के नाम पर सिसयासत हो रही है।
केवल धर्म के नाम पर एक दूसरे का नरसंहार किया जा रहा है। मानव धर्म के सामने इंसानियत का क़त्ल कर रहा है। मानवता कलंकित हुई जा रही है। कभी ईश्वर ने यह अनुमान लगाया ही नहीं होगा की एक दिन ऐसा आएगा जब उसी का मंदिर बनाने के लिए इंसान एक दूसरे का क़त्ल करेगा।
घर में पत्थर की माता की मूर्ती को सालों तक सजाया जाता है, पूजा की जाती है, उस कमरे के खाली पाँव जाय जाता है, भोग लगाए जाते है परन्तु उसी घर में कन्या की जन्म से पहले ही हत्या कर दी जाती है।
केवल धर्म के नाम पर एक दूसरे का नरसंहार किया जा रहा है। मानव धर्म के सामने इंसानियत का क़त्ल कर रहा है। मानवता कलंकित हुई जा रही है। कभी ईश्वर ने यह अनुमान लगाया ही नहीं होगा की एक दिन ऐसा आएगा जब उसी का मंदिर बनाने के लिए इंसान एक दूसरे का क़त्ल करेगा।
घर में पत्थर की माता की मूर्ती को सालों तक सजाया जाता है, पूजा की जाती है, उस कमरे के खाली पाँव जाय जाता है, भोग लगाए जाते है परन्तु उसी घर में कन्या की जन्म से पहले ही हत्या कर दी जाती है।
धर्म से पुण्य कमाने को व्यक्ति तीर्थ जाता है परन्तु यह कभी समझ नहीं पाता की जिस तीर्थ का फल माता ने बेटी के रूप में घर में भेजा था उसे जन्म से पहले ही माता को सौप दिया गया है।
पूरे वर्ष घर की हालत कूड़ेदान से कम नहीं होती पर दिवाली आने के 2 हफ्ते पहले से ही केवल माता को प्रसन्न करने के लिए, धन की लालच सफाई करने में विवश कर देती है।
आजकल ईश्वर की पूजा, प्रार्थना और आराधना केवल डर और लालच की पूर्ती के लिए किये जाते हैं।
सच कहा जाए तो मनुष्य के कभी भी भक्ति के असली स्वरुप को नहीं जाना (मैंने भी नहीं)
बचपन में भगवान् की आराधना की क्यूंकि विद्यालय में पास होने और ज्यादा से ज्यादा अंक लाने की होड़ थी। यहां भी अपना लालच ही देखा। पर पास होने के बाद भी एक बार ईश्वर को याद नहीं किया।
बड़े हुए तो नौकरी पाने के लिए फिर से भगवन के सामने लेट गये। व्यापर अच्छा हो गया, नौकरी भी मिल गयी पर फिर भी एक बार भी ईश्वर को याद नहीं किया।
अब मृत्यु नज़दीक आ गयी। फिर अब दान धर्म, तीर्थ करने लगे। जो कभी मंदिर की सीढ़ियां तक नहीं चढ़ा आज वो दान धर्म और तीर्थ यात्रा कर रहा है। इसके पीछे भी एक लालच ही है ताकि मरने के पश्चात स्वर्ग की प्राप्ति हो।
हर जगह धर्म के नाम पर ढोंग किया जा रहा है। और तो और आजकल इसे ही सच्ची आस्था का नाम दिया जाता है।
ईश्वर ने कभी यह नहीं कहा की मनुष्य को छोड़ के मेरी चाकरी कर। पर मनुष्य ने भूखे की थाली का निवाला छीनकर उस पत्थर की मूर्ती को देना उचित समझा।
इस धरा में ईश्वर किसी भी रूप में आपके समक्ष आ सकता है, वह सुख में भी आता है और दुःख में तो हमेशा आपके साथ रहता है।
तो प्रश्न यह उठता है की आखिर कैसे पहचाने की भगवन किस रूप में है?
उत्तर यह है:- जब भी आपको लगे की आप कष्ट में हैं तो उस क्षण जो आपको संभाले, जो आपके परेशानी का हल दे और जो आपको आपकी परेशानी से निकलने में अपनी पूरी ताकत लगा दे उसी रूप में भगवान् आपके पास आता है।
ईश्वर भी उसी की मदद करता है जो अच्छे कर्म को महत्व देता है न की आस्था और धर्म का आडम्बर करे।
अतः झूठे धर्म का आडम्बर, झूठी आस्था और ईश्वर के प्रति लालच के भाव को छोड़ कर थोड़े अच्छे कर्म को बढ़ावा दिया जाए तो मानवता धन्य हो जायेगी।
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