देशभक्ति, राजनीति एवं हिन्दुत्व रुपी त्रिकोण !
वक्त के साथ लोगों की सोच और दूसरों के प्रति भावनाओं को बदलते हुए देखा है परन्तु कभी भी नकारात्मक भावना को सकारात्मक में परिवर्तित होते नहीं देखा बल्कि सत्यता इसके विपरीत ही मालूम पड़ती है।
एक समय था जब हमारे परम पूजनीय राष्ट्रपिता श्री मोहनदास करमचंद गाँधी जी का सम्मान राह में पड़ा वो एक सूक्ष्म कण भी करता था जो भारत की स्वतंत्रता की राह का साक्षी था। कईं व्यक्तियों ने उनके कार्य को सराहा था, शत्रु भी उनके व्यक्तित्व से प्प्रभावित हो जाते थे, उनकी राह का हर फूल उनके पगों के स्पर्श को अपना सौभाग्य मानता था।
और आज उसी महान व्यक्तित्व की महानता पर प्रश्न चिह्न उठ खड़ा है !
आज किसी का भेजा हुआ नथूराम गोडसे का यह लेख पढ़ा।
अब आते हैं महात्मा गाँधी की बात पर। आज उस नथूराम गोडसे की वाह - वाही हो रही है जिसने उस महान व्यक्ति की हत्या की थी जिसकी सम्मान में आज भी हम अपनी मुद्रा में उनकी तस्वीर लगाते हैं। आज कईं लोगों को लगता है की महात्मा गाँधी ने देश की आज़ादी में कोई महत्वपूर्ण भूमिका अदा नहीं की। आजकल हर कोई शहीद भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस, झांसी की रानी इत्यादि की ही चर्चा करता है।
कुछ लोगों के अनुसार महात्मा गाँधी ढोंगी थे और उन्होंने बिना लड़ाई और बिना मार धाड़ के सबका मान छीन लिया है।
मैं सभी का सम्मान करता हूँ। ऐसा नहीं है की मैं शहीद भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस, झांसी की रानी इत्यादि का सम्मान नहीं करता बल्कि असली बात तो यह है की मैं किसी की बुराई नहीं करता। मैं किसी को महानता के तराजू में तौलकर नहीं देखता। मेरे लिए सब बराबर हैं। हर किसी का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण था। मैं मानता हूँ की महात्मा कभी लड़ाई में नहीं गए, कभी गोली नहीं खायी, छोटी सी उम्र में फांसी में नहीं लटके परन्तु उन्होंने अहिंसा के सहारे भारत की आज़ादी में अपनी भूमिका बखूबी से निभायी है।
क्या आवश्यकता थी उस व्यक्ति को आज़ादी ली लड़ाई में जाने की जिसके पास भरा पूरा परिवार था, एक सम्मानजनक नौकरी। अंग्रेजी हुकूमत का सम्मान भी उसके साथ था, वो चाहता तो बिना किसी की नज़रों में आये सांसारिक सुविधाओं का आराम से उपयोग कर अपना जीवन काट सकता था। उसे अन्य देश में काले - गोरे के सम्मान के लिए क्यों लड़ना पड़ा। अपने देश में इतने आंदोलन क्यों करने पड़े। बार बार जेल जाने का शौक तो उसे भी नहीं था। इतनी आलिशान जिंदगी छोड़कर कौन जाता है मरने। अपनी अर्धांगिनी, पुत्र-पुत्री, माता-पिता की चिंता छोड़कर क्या आवश्यकता थी उसे देश के लोगों के बारे में सोचने की। सिर्फ एक गोली उसकी सारी जीवन नैया को समाप्त कर सकती थी परन्तु फिर भी उसके उसी हिंसक नदी में चलना उचित समझा। जिस उम्र में व्यक्ति भोग-विलास के बारे में सोचता है उस उम्र में इसे क्या आवश्यकता थी किसानो के लिए लड़ने की।
अब आते हैं हिन्दू - मुसलमान पर। ऊपर चित्र में बताया गया की महात्मा गाँधी ने मुस्लमानों के लिए अनशन किया। तो क्या हुआ इससे। एक बात ध्यान में रखना आवश्यक है की आज़ादी से पहले मुसलमान बहुल देश पकिस्तान भी हमारा ही हिस्सा था। दोनों तरफ के लोगों ने साथ में लड़ाई लड़ी है। उस समय किसी ने भारत - पाकिस्तान के बारे में नहीं सोचा। उस समय हिन्दू - मुस्लिम का भेद नहीं था। उद्देश्य एक था - अंग्रेज़ों से आज़ादी। उस समय यदि महात्मा ने हमारे मुसलमान भाइयों के लिए कुछ अच्छा करने की सोची थी तो क्या इतने में उन्हें मारने की आवश्यकता थी। क्या हिन्दुत्व यही है की दूसरे के बारे में कुछ करने पर आपको मरना पड़े।
यदि उस समय पकिस्तान के साथ अपने रिश्ते अच्छे किये होते तो शायद आ हम दुश्मनी और बैर का यह खेल नहीं खेल रहे होते।
क्यों गुमान है तुम्हे अपने हिन्दू होने पर? मैं भी हिन्दू हूँ पर मैं दूसरों को मानवता की नज़रों से देखता हूँ। धर्म की नज़र से देखने पर अपने धर्म के अलावा बांकी सब अधर्म ही लगता है। मानता हूँ की कुछ लोग हो सकते है दूसरे धर्म में जो हिंसा फैलाते हैं पर इसका मतलब यह तो नहीं की बांकी सब को भी उसी नज़रों से देखा जाए।
निष्कर्ष यह निकलता है:- सबका सम्मान करो क्यूंकि इस धरा में सबकी अपनी पहचान और सबका अपना महत्व है। गाडी की चकाचौंध को देखकर कभी उन पहियों को अनदेखा मत करना क्यूंकि उन्ही पहियों की बदौलत उस वाहन का अस्तित्व है। गाँधी, नेहरू, बोस, भगत सिंह सब महान थे, हैं और रहेंगे पर कभी भी उनकी महानता की तुलना मत करना। क्या पता वो भी एक दिन आ सकता है जब आज अच्छे लगने वाले अब्दुल कलम और मोदी भी भविष्य में अपना अस्तित्वा खो दें।
और धर्म को परिवार और समाज तक ही रहने दो। जिस दिन धर्म का राजनीति से सम्मलेन हो गया उस दिन तुम्हे ऊपर लिखी एक हत्यारे की बातें अच्छी लगनी लगेंगी और मावता हार जायर्गी।
एक समय था जब हमारे परम पूजनीय राष्ट्रपिता श्री मोहनदास करमचंद गाँधी जी का सम्मान राह में पड़ा वो एक सूक्ष्म कण भी करता था जो भारत की स्वतंत्रता की राह का साक्षी था। कईं व्यक्तियों ने उनके कार्य को सराहा था, शत्रु भी उनके व्यक्तित्व से प्प्रभावित हो जाते थे, उनकी राह का हर फूल उनके पगों के स्पर्श को अपना सौभाग्य मानता था।
और आज उसी महान व्यक्तित्व की महानता पर प्रश्न चिह्न उठ खड़ा है !
आज किसी का भेजा हुआ नथूराम गोडसे का यह लेख पढ़ा।
मैं नहीं जानता इस लेख में कितनी सच्चाई है परन्तु यह अवश्य ज्ञात है की इसमें जो लिखा उसमे आधा असत्य है। आजकल हर व्यक्ति अपने विचारों को किसी स्वतंत्रता सेनानी की छवि के साथ लिख देता है। यह राजनीति का एक और खेला है। इससे लोग लिखी हुई बातों को सत्य मान कर आत्मसाथ कर लेते हैं क्यूंकि हम अपने स्वंत्रता सेनानी का सम्मान करते हैं और राजनीतिज्ञ उसी सम्मान का फायदा उठाते है ऐसे लेख लिखकर। उन्हें भी पता है की किसी भी स्वंत्रता सेनानी की छवि के साथ अपने मन - गढंत विचार डाल देने से लोग उस पर आसानी से विश्वास कर लेते हैं।
अब आते हैं महात्मा गाँधी की बात पर। आज उस नथूराम गोडसे की वाह - वाही हो रही है जिसने उस महान व्यक्ति की हत्या की थी जिसकी सम्मान में आज भी हम अपनी मुद्रा में उनकी तस्वीर लगाते हैं। आज कईं लोगों को लगता है की महात्मा गाँधी ने देश की आज़ादी में कोई महत्वपूर्ण भूमिका अदा नहीं की। आजकल हर कोई शहीद भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस, झांसी की रानी इत्यादि की ही चर्चा करता है।
कुछ लोगों के अनुसार महात्मा गाँधी ढोंगी थे और उन्होंने बिना लड़ाई और बिना मार धाड़ के सबका मान छीन लिया है।
मैं सभी का सम्मान करता हूँ। ऐसा नहीं है की मैं शहीद भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस, झांसी की रानी इत्यादि का सम्मान नहीं करता बल्कि असली बात तो यह है की मैं किसी की बुराई नहीं करता। मैं किसी को महानता के तराजू में तौलकर नहीं देखता। मेरे लिए सब बराबर हैं। हर किसी का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण था। मैं मानता हूँ की महात्मा कभी लड़ाई में नहीं गए, कभी गोली नहीं खायी, छोटी सी उम्र में फांसी में नहीं लटके परन्तु उन्होंने अहिंसा के सहारे भारत की आज़ादी में अपनी भूमिका बखूबी से निभायी है।
क्या आवश्यकता थी उस व्यक्ति को आज़ादी ली लड़ाई में जाने की जिसके पास भरा पूरा परिवार था, एक सम्मानजनक नौकरी। अंग्रेजी हुकूमत का सम्मान भी उसके साथ था, वो चाहता तो बिना किसी की नज़रों में आये सांसारिक सुविधाओं का आराम से उपयोग कर अपना जीवन काट सकता था। उसे अन्य देश में काले - गोरे के सम्मान के लिए क्यों लड़ना पड़ा। अपने देश में इतने आंदोलन क्यों करने पड़े। बार बार जेल जाने का शौक तो उसे भी नहीं था। इतनी आलिशान जिंदगी छोड़कर कौन जाता है मरने। अपनी अर्धांगिनी, पुत्र-पुत्री, माता-पिता की चिंता छोड़कर क्या आवश्यकता थी उसे देश के लोगों के बारे में सोचने की। सिर्फ एक गोली उसकी सारी जीवन नैया को समाप्त कर सकती थी परन्तु फिर भी उसके उसी हिंसक नदी में चलना उचित समझा। जिस उम्र में व्यक्ति भोग-विलास के बारे में सोचता है उस उम्र में इसे क्या आवश्यकता थी किसानो के लिए लड़ने की।
अब आते हैं हिन्दू - मुसलमान पर। ऊपर चित्र में बताया गया की महात्मा गाँधी ने मुस्लमानों के लिए अनशन किया। तो क्या हुआ इससे। एक बात ध्यान में रखना आवश्यक है की आज़ादी से पहले मुसलमान बहुल देश पकिस्तान भी हमारा ही हिस्सा था। दोनों तरफ के लोगों ने साथ में लड़ाई लड़ी है। उस समय किसी ने भारत - पाकिस्तान के बारे में नहीं सोचा। उस समय हिन्दू - मुस्लिम का भेद नहीं था। उद्देश्य एक था - अंग्रेज़ों से आज़ादी। उस समय यदि महात्मा ने हमारे मुसलमान भाइयों के लिए कुछ अच्छा करने की सोची थी तो क्या इतने में उन्हें मारने की आवश्यकता थी। क्या हिन्दुत्व यही है की दूसरे के बारे में कुछ करने पर आपको मरना पड़े।
यदि उस समय पकिस्तान के साथ अपने रिश्ते अच्छे किये होते तो शायद आ हम दुश्मनी और बैर का यह खेल नहीं खेल रहे होते।
क्यों गुमान है तुम्हे अपने हिन्दू होने पर? मैं भी हिन्दू हूँ पर मैं दूसरों को मानवता की नज़रों से देखता हूँ। धर्म की नज़र से देखने पर अपने धर्म के अलावा बांकी सब अधर्म ही लगता है। मानता हूँ की कुछ लोग हो सकते है दूसरे धर्म में जो हिंसा फैलाते हैं पर इसका मतलब यह तो नहीं की बांकी सब को भी उसी नज़रों से देखा जाए।
निष्कर्ष यह निकलता है:- सबका सम्मान करो क्यूंकि इस धरा में सबकी अपनी पहचान और सबका अपना महत्व है। गाडी की चकाचौंध को देखकर कभी उन पहियों को अनदेखा मत करना क्यूंकि उन्ही पहियों की बदौलत उस वाहन का अस्तित्व है। गाँधी, नेहरू, बोस, भगत सिंह सब महान थे, हैं और रहेंगे पर कभी भी उनकी महानता की तुलना मत करना। क्या पता वो भी एक दिन आ सकता है जब आज अच्छे लगने वाले अब्दुल कलम और मोदी भी भविष्य में अपना अस्तित्वा खो दें।
और धर्म को परिवार और समाज तक ही रहने दो। जिस दिन धर्म का राजनीति से सम्मलेन हो गया उस दिन तुम्हे ऊपर लिखी एक हत्यारे की बातें अच्छी लगनी लगेंगी और मावता हार जायर्गी।

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