The Game of Religion - धार्मिक क्रीड़ा !

धर्म - एक ऐसा विषय जिसके बारे में हम कम ही बात करते हैं परंतु अपने दैनिक जीवन मे ऐसे कईं वाकिये और घटनाएं घटित होती हैं जो आपको धर्म के ऊपर लिखने में मजबूर करती हैं।
इस लेख का उद्देश्य किसी धर्म को ऊपर उठाना, धर्म की अवहेलना करना, धर्म का प्रचार, किसी के मन को आहत करना और किसी धार्मिक क्रिया को छोटा दिखाना नहीं है। इसमें केवल हमने अपने विचार व्यक्त किये हैं। हो सकता है इनमे से कईं बातों पर आप सहमत हों और कईं बातों पर नहीं, परन्तु इस लेख से यदि किसी को कुछ सीख मिल जाये हो हमारे लिखने का उद्देश्य पूर्ण हो जाए।
आज कुछ ऐसी ही घटनाओं का विश्लेषण करेंगे और जानेंगे कि क्या ऐसा करना या ऐसे कृत्य सही हैं।
1. आज सुबह एक महिला दिखीं जो नंगे पांव घर से मंदिर जा रहीं थीं। सुबह सुबह इतनी ठंड, खाली पैर और सड़क की मिट्टी से भरपूर जमीन। मंदिर भी पास नही बल्कि लगभग 2 KM का सफर।
उनके लिए यह शायद आस्था का विषय था परंतु कभी इसके नकारात्मक प्रभाव की तरफ किसी का ध्यान नही जाता। 4℃ की इतनी सुबह में घर से निकलना ही घातक है। ऊपर से नंगे पांव। सड़क का गंदा पानी, रेत, जानवरों का मल और न जाने क्या क्या उन पैरों से होकर हानिकारक जीवाणु आपके शरीर तक जाते हैं। मंदिर में जाकर दुआ मांगने से, आने वाली बीमारियां अपने आप समाप्त नही होंगी।
यदि आपको अपनी श्रद्धा दिखानी है तो कृपया पहले अपने तन का ध्यान रखें। मन की शुद्धि तभी हो पाएगी जब तन स्वस्थ हो। ईश्वर आपसे कभी नही कहेंगे कि अपने तन को कष्ट देकर पहले मुझे प्रसन्न कर।
2. अब बात करते हैं उन लोगों की जो बार बार धार्मिक स्थलों के दर्शन करने चले जाते हैं। हमें कोई दिक्कत नही है कि आप कितने बार जा रहे हो, वो आपकी मर्जी और इच्छा है परंतु क्या बार बार, हर बात पे भगवान को परेशान करना जायज़ है। ईश्वर ने अच्छे कर्म करके की बात कही है, अच्छे कर्म में भगवान का वास होता है न कि बार बार मंदिर जाकर। कुछ लोगों का तो मंदिर जाना भी अच्छा लगता है क्योंकि वो सेवा करने और दुखियों की मदद करते हैं परंतु वह लोग जो बार बार अपने दुखड़े रोने जाते हैं उनका क्या करें। बेचारी गंगा भी कितने पाप धोएगी जब वो ही इतनी मैली हो गयी।
ज्यादातर लोगों के धार्मिक स्थल जाने का उद्देश्य या तो घूमना फिरना होता है या कुछ लालच व इच्छा, परंतु कभी मैंने ऐसा व्यक्ति नही देखा जो केवल ईश्वर को धन्यवाद करने के लिए गया हो।
3. अब चलते हैं मंदिर के अंदर। वहां पर एक बड़ी सी दान पेटी रहती है। चाहे मंदिर छोटा ही क्यों न हो पर दान पेटी हमेशा बड़ी ही होती है। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो जी भर कर दान करते हैं। वो पैसों को उतना महत्व नहीं देते। जब वो दान करते हैं तो हमारे पूजनीय मंडित जी भी उसी के हिसाब से उनकी खातिर करते हैं। उन्हें विशेष रूप रूप से रखा प्रसाद दिया जाता है। फूलों की माला, भगवान् का हार और न जाने क्या क्या।
अब एक और भक्त मंदिर में आया। गरीब था वो। देने के लिए उनके पास आस्था और ईश्वर के प्रति श्रद्धा के अलावा कुछ नहीं था। अब ऐसे लोगों के प्रति पंडित की क्रिया भी अलग रहती है। पहले तो पंडित ऐसे लोगों को देखना भी पसंद नहीं करते। यदि गलती से देख भी लिया तो प्रसाद के रूप में दिया जाता है चीनी के 2 दाने। वो गरीब व्यक्ति भी इसी से खुश हो जाता है। उसकी संतुष्टि इसी में होती है।
अब आते हैं असली बात पर। धार्मिक स्थलों में भी ईश्वर की भक्ति के ऊपर धन की शक्ति विद्यमान रहती है। यहां तक की ईश्वर के दूत (पंडित) भी धन के समक्ष घुटने टेक देते हैं। उनके यह आसमान व्यवहार ही धर्म के ऊपर से लोगों का भरोसा उठा देते हैं।
4. अब जाते हैं उनके पास हो ईश्वर से व्यापर करते हैं। जैसे:- अगर मेरा बेटा हुआ तो आपको 5,100 रूपए चढ़ाऊंगा, परीक्षा में पास हो गया तो वैष्णो देवी जाऊँगा, मनपसंद जगह पर नौकरी लग जाए तो गरीबों को भोजन खिलाऊंगा, व्यापर में फाएदा हो जाए तो 21 ब्राह्मणों को भोजन कराऊंगा इत्यादि। यह वो लोग हैं जो स्वयं कुछ करने से ज्यादा मांगने पर विश्वास रखते हैं। यदि इच्छा पूरी हो जाए तो इनकी इच्छाएं और बढ़ जाती हैं परन्तु यदि इच्छा पूरी नहीं हो पायी तो उस धार्मिक स्थल को अवहेलना करने लगते हैं। फिर लोगों में कहते फिरते है की वहां कुछ भी मांगोगे तो कुछ नहीं मिलेगा। फिर वो किसी और जगह की तलाश करने लगते हैं।
निष्कर्ष यह निकलता है, लोग ईश्वर पर नहीं व्यापर में अधिक भरोसा करने लगे हैं। अब तो ईश्वर भी उनके लिए एक व्यापारी बन कर रह गया है। जहाँ से व्यापर में मुनाफा हो गया वहाँ जुड़े रहेंगे और कभी नुक़सान हो गया तो नए व्यापारी की तलाश में निकल पड़ते हैं।
5. अपना धर्म, धर्म है और बांकी धर्म, अधर्म। यह तथ्य भी एक कटु सत्य है। हर कोई अपने धर्म को ऊपर लाने की होड़ में लगा हुआ है। दूसरे धर्म के रीती रिवाज, क्रियाकलाप और व्यक्ति यदि आपको अपने धर्म से निचे लगते है तो समझ लो आप भी उसी क़तार में हैं। महान विद्वान् व्यक्तियों के अनुसार - ईश्वर ने धर्म नहीं बनाया, यह मनुष्य के विकृत सोच की उपज है।
चलो एक पल के लिए मान लेते हैं की ईश्वर ने धर्म बनाया, पर उसने धर्म के बीच लड़ाई करने को नहीं कहा होगा, दूसरे धर्म को निचा दिखाने और उसकी निंदा करके को नहीं कहा होगा और धर्म के नाम पर हत्या तो कभी नहीं।
फिर भी लोग न जाने क्यों अपने धर्म को ऊपर उठाने में लगे हैं। मानवता ही एक ऐसी कड़ी है जो ईश्वर ने बनायी है, ऐसा हम मानते हैं।
इंसान में धर्म के आधार पर भेदभाव करने की शक्ति आती है जब वह बाल्यवस्था को त्याग देता है वरना बचपन में तो हम मित्रों को केवल नाम से जानते थे, इज्जत और प्यार से जानते थे न की धर्म से। शिक्षा मानवता को ऊपर लाने, विकास की नीवं और धर्म से ऊपर उठने की कड़ी है परन्तु शिक्षा अर्जन ही धर्म के आधार पर भेदभाव का एक जरिया है। जैसे जैसे शैक्षिक स्तर पर आप ऊपर जाते है उतना ही धर्म के स्तर पर गिरते जाते हैं। समाज और शिक्षा का मिश्रण ही हमे धर्म के आधार पर भेदभाव करना सिखाता है।
इस लेख का उद्देश्य किसी धर्म को ऊपर उठाना, धर्म की अवहेलना करना, धर्म का प्रचार, किसी के मन को आहत करना और किसी धार्मिक क्रिया को छोटा दिखाना नहीं है। इसमें केवल हमने अपने विचार व्यक्त किये हैं। हो सकता है इनमे से कईं बातों पर आप सहमत हों और कईं बातों पर नहीं, परन्तु इस लेख से यदि किसी को कुछ सीख मिल जाये हो हमारे लिखने का उद्देश्य पूर्ण हो जाए।
आज कुछ ऐसी ही घटनाओं का विश्लेषण करेंगे और जानेंगे कि क्या ऐसा करना या ऐसे कृत्य सही हैं।
1. आज सुबह एक महिला दिखीं जो नंगे पांव घर से मंदिर जा रहीं थीं। सुबह सुबह इतनी ठंड, खाली पैर और सड़क की मिट्टी से भरपूर जमीन। मंदिर भी पास नही बल्कि लगभग 2 KM का सफर।
उनके लिए यह शायद आस्था का विषय था परंतु कभी इसके नकारात्मक प्रभाव की तरफ किसी का ध्यान नही जाता। 4℃ की इतनी सुबह में घर से निकलना ही घातक है। ऊपर से नंगे पांव। सड़क का गंदा पानी, रेत, जानवरों का मल और न जाने क्या क्या उन पैरों से होकर हानिकारक जीवाणु आपके शरीर तक जाते हैं। मंदिर में जाकर दुआ मांगने से, आने वाली बीमारियां अपने आप समाप्त नही होंगी।
यदि आपको अपनी श्रद्धा दिखानी है तो कृपया पहले अपने तन का ध्यान रखें। मन की शुद्धि तभी हो पाएगी जब तन स्वस्थ हो। ईश्वर आपसे कभी नही कहेंगे कि अपने तन को कष्ट देकर पहले मुझे प्रसन्न कर।
2. अब बात करते हैं उन लोगों की जो बार बार धार्मिक स्थलों के दर्शन करने चले जाते हैं। हमें कोई दिक्कत नही है कि आप कितने बार जा रहे हो, वो आपकी मर्जी और इच्छा है परंतु क्या बार बार, हर बात पे भगवान को परेशान करना जायज़ है। ईश्वर ने अच्छे कर्म करके की बात कही है, अच्छे कर्म में भगवान का वास होता है न कि बार बार मंदिर जाकर। कुछ लोगों का तो मंदिर जाना भी अच्छा लगता है क्योंकि वो सेवा करने और दुखियों की मदद करते हैं परंतु वह लोग जो बार बार अपने दुखड़े रोने जाते हैं उनका क्या करें। बेचारी गंगा भी कितने पाप धोएगी जब वो ही इतनी मैली हो गयी।
ज्यादातर लोगों के धार्मिक स्थल जाने का उद्देश्य या तो घूमना फिरना होता है या कुछ लालच व इच्छा, परंतु कभी मैंने ऐसा व्यक्ति नही देखा जो केवल ईश्वर को धन्यवाद करने के लिए गया हो।
3. अब चलते हैं मंदिर के अंदर। वहां पर एक बड़ी सी दान पेटी रहती है। चाहे मंदिर छोटा ही क्यों न हो पर दान पेटी हमेशा बड़ी ही होती है। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो जी भर कर दान करते हैं। वो पैसों को उतना महत्व नहीं देते। जब वो दान करते हैं तो हमारे पूजनीय मंडित जी भी उसी के हिसाब से उनकी खातिर करते हैं। उन्हें विशेष रूप रूप से रखा प्रसाद दिया जाता है। फूलों की माला, भगवान् का हार और न जाने क्या क्या।
अब एक और भक्त मंदिर में आया। गरीब था वो। देने के लिए उनके पास आस्था और ईश्वर के प्रति श्रद्धा के अलावा कुछ नहीं था। अब ऐसे लोगों के प्रति पंडित की क्रिया भी अलग रहती है। पहले तो पंडित ऐसे लोगों को देखना भी पसंद नहीं करते। यदि गलती से देख भी लिया तो प्रसाद के रूप में दिया जाता है चीनी के 2 दाने। वो गरीब व्यक्ति भी इसी से खुश हो जाता है। उसकी संतुष्टि इसी में होती है।
अब आते हैं असली बात पर। धार्मिक स्थलों में भी ईश्वर की भक्ति के ऊपर धन की शक्ति विद्यमान रहती है। यहां तक की ईश्वर के दूत (पंडित) भी धन के समक्ष घुटने टेक देते हैं। उनके यह आसमान व्यवहार ही धर्म के ऊपर से लोगों का भरोसा उठा देते हैं।
4. अब जाते हैं उनके पास हो ईश्वर से व्यापर करते हैं। जैसे:- अगर मेरा बेटा हुआ तो आपको 5,100 रूपए चढ़ाऊंगा, परीक्षा में पास हो गया तो वैष्णो देवी जाऊँगा, मनपसंद जगह पर नौकरी लग जाए तो गरीबों को भोजन खिलाऊंगा, व्यापर में फाएदा हो जाए तो 21 ब्राह्मणों को भोजन कराऊंगा इत्यादि। यह वो लोग हैं जो स्वयं कुछ करने से ज्यादा मांगने पर विश्वास रखते हैं। यदि इच्छा पूरी हो जाए तो इनकी इच्छाएं और बढ़ जाती हैं परन्तु यदि इच्छा पूरी नहीं हो पायी तो उस धार्मिक स्थल को अवहेलना करने लगते हैं। फिर लोगों में कहते फिरते है की वहां कुछ भी मांगोगे तो कुछ नहीं मिलेगा। फिर वो किसी और जगह की तलाश करने लगते हैं।
निष्कर्ष यह निकलता है, लोग ईश्वर पर नहीं व्यापर में अधिक भरोसा करने लगे हैं। अब तो ईश्वर भी उनके लिए एक व्यापारी बन कर रह गया है। जहाँ से व्यापर में मुनाफा हो गया वहाँ जुड़े रहेंगे और कभी नुक़सान हो गया तो नए व्यापारी की तलाश में निकल पड़ते हैं।
5. अपना धर्म, धर्म है और बांकी धर्म, अधर्म। यह तथ्य भी एक कटु सत्य है। हर कोई अपने धर्म को ऊपर लाने की होड़ में लगा हुआ है। दूसरे धर्म के रीती रिवाज, क्रियाकलाप और व्यक्ति यदि आपको अपने धर्म से निचे लगते है तो समझ लो आप भी उसी क़तार में हैं। महान विद्वान् व्यक्तियों के अनुसार - ईश्वर ने धर्म नहीं बनाया, यह मनुष्य के विकृत सोच की उपज है।
चलो एक पल के लिए मान लेते हैं की ईश्वर ने धर्म बनाया, पर उसने धर्म के बीच लड़ाई करने को नहीं कहा होगा, दूसरे धर्म को निचा दिखाने और उसकी निंदा करके को नहीं कहा होगा और धर्म के नाम पर हत्या तो कभी नहीं।
फिर भी लोग न जाने क्यों अपने धर्म को ऊपर उठाने में लगे हैं। मानवता ही एक ऐसी कड़ी है जो ईश्वर ने बनायी है, ऐसा हम मानते हैं।
इंसान में धर्म के आधार पर भेदभाव करने की शक्ति आती है जब वह बाल्यवस्था को त्याग देता है वरना बचपन में तो हम मित्रों को केवल नाम से जानते थे, इज्जत और प्यार से जानते थे न की धर्म से। शिक्षा मानवता को ऊपर लाने, विकास की नीवं और धर्म से ऊपर उठने की कड़ी है परन्तु शिक्षा अर्जन ही धर्म के आधार पर भेदभाव का एक जरिया है। जैसे जैसे शैक्षिक स्तर पर आप ऊपर जाते है उतना ही धर्म के स्तर पर गिरते जाते हैं। समाज और शिक्षा का मिश्रण ही हमे धर्म के आधार पर भेदभाव करना सिखाता है।
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