Beautiful Story of Attraction - नेत्रों का प्रेम जाल !

Woman Wearing Hijab

मैंने कभी मदिरापान तो नहीं किया पर पता नहीं उसकी आँखों में ऐसा क्या छुपा था !

मैंने कभी सोचा नहीं शीतपहर की वो सामान्य प्रातः इतनी ऊर्जामय होगी।

सदैव की तरह दफ्तर का समय हुआ था। घर से निकला। घर में किसी बात से खफा था और जाते समय सड़क की वो पथरीली जमीन मेरे आतंरिक क्रोध की परीक्षा ले रही थी। ऊपर से वाहन का समय पर न आना, समय पर दफ्तर न पहुंच पाने की चिंता को उर्जित किये जा रहा था।

ईश्वर की कृपा से वाहन का आगमन समय पर हुआ। सीट भी मिल गयी। जैसे ही अपने स्थान में मैंने आसन ग्रहण किया वैसे ही मैंने संगीत यन्त्र निकलकर अपने कानों में संगीत की मधुर ध्वनि से अपनी चिंताओं और क्रोध को शांत करने का प्रयत्न किया।

फिर वो घटना घटित हुई जिसके रोज घटित होने का आज तक मुझे सदैव इंतजार रहता है।

एक ऐसी भावना ने ह्रदय में घर किया जो अपूर्व थी।

उस सुन्दर काया की एक झलक मेरे उस क्रोध और चिंता को ऐसे निगल कर शांति प्रदान कर गयी जिस तरह समुद्र मंथन में निकला विष भोलेशंकर ने निगल कर देवताओं को शांति प्रदान की थी। कान में संगीत के बोल निःशब्द पद गए। सडकों से निकली वाहनों की ध्वनि सुनाई नहीं दे रही थी। उन नेत्रों से उत्कर्षित उस सम्मोहन रुपी त्रिशूल ने जिस तरह मेरे ह्रदय को विदीर्ण किया उसका अनुभव और उसका प्रभाव ही अद्वितीय था।

मानो ऐसा लग रहा था की उनकी आखें यह गीत गुनगुना रही हों - https://www.youtube.com/watch?v=cXdJJvpgTvw

और मेरी आँखें यह वाला संगीत महसूस कर रही थीं - https://www.youtube.com/watch?v=I5t894l5b1w

Woman Covering Her Face With Corn Leaves

दिखने में एक सामान्य काया थी वो। परन्तु उसकी आतंरिक शक्ति केवल दो नेत्रों ने ही मेरे हृदय रुपी जमीन पर भारी आभास हो रही थी।

मुखचित्र को काले रेशमी वस्त्र से ढका हुआ था। केवल दो नेत्रों के दर्शन हो रहे थे। कद काठी सामान्य। पहनावे में काले रंग के वस्त्र उस गोरी काया को एक अलग ही पहचान दे रही थी।

उन हाथों की मनमोहकता और आकर्षण में किसी भी निर्जीव वस्तु को भी जीवन दान देने की शक्ति समाये हुए थी।

सफर शुरू हो गया था वाहन का और मेरा भी। अब कानों में अपनी मनपसंद संगीत के उस चलचित्र को मन में धारण करके उसमे नायिका की जगह पर उस काया को निरूपित करके मैं संगीत का आनंद ले रहा था। नेत्र बार बार उसकी तरफ पता नहीं स्वयं ही चले जाते थे।

मैंने उस दिन एक चीज सीखी थी - किसी भी सुन्दर काया (पुरुष या महिला के अनुसार अपने अपने स्वाद पर निर्भर) को देखने पर हमारे मन में प्रेम के दो ख्याल उभरते हैं। पहला ख्याल होता है जो केवल शारीरिक सम्मोहन को आकर्षित करता है और दूसरा होता है मन का प्रेम। यदि किसी को देखकर आपको केवल उससे शारीरिक सुख प्राप्त करने की इच्छा जागृत होती है तो वो सच्चा प्रेम नहीं होता। वो केवल जिस्म की भूख से आकर्षित होती है जी किसी अन्य में भी स्थानांतरित हो सकती है।

वहीँ दूसरी तरफ वो प्रेम या वो आकर्षण की भावना जो देह को देखकर नहीं अपितु आतंरिक सुन्तरता व सादगी को देखकर उत्पन्न होती है वो सच्चा प्रेम कहलाती है। यह शारीरिक सुख की तरह दूसरे में स्थानांतरित नहीं होती अपितु समय के साथ साथ और दृढ़ होती जाती है। यह सर्वमान्य सत्य है। परन्तु आजकल का प्रेम सम्बन्ध केवल शारीरिक सुख तक रहता है। आतंरिक प्रेम की अनुभूति केवल माता पिता या मित्रों से ही होती है।

ऊपर से यह गीत शहद में मिठास घोलने का काम कर रहा था। - https://www.youtube.com/watch?v=S-ezhTXPVGU

वो इन सब से अनजान अपने कानों में संगीत की ध्वनि में व्यस्त थी।

मैंने तो अपने जीवन के भविष्य में उसको रखकर सुखद सपने बुनने शुरू भी कर दिए थे।

इसे पहली झलक को प्रेम नहीं कहा जा सकता। यह तो केवल एक आकर्षण है जो केवल दो नेत्रों के दर्शन से ही टिका है और जो कभी भी प्रेम में परिणत भी हो सकता है।

ऐसे ही कईं दिन बीत गए। मैं रोज समय से पहले आ जाता था। समय पर आयी वाहनों को छोड़ देता और उस वाहन का इंतज़ार करता जिसमे वह सुन्दर काया बैठे। फिलहाल तो यह एक तरफ़ा आकर्षण और प्रेम का अंकुरित बीज है परन्तु यह जांचने के लिए की यह दो तरफ़ा है की नहीं, मुझ में हिम्मत नहीं रही इजहार करने की।

अब मंजर यह है कि उसको न देखने पर लगता है कुछ खाली खाली समय व्यतीत हो रहा है।

परन्तु अब समय धीरे धीरे बीत रहा है। आगे क्या होगा किसी को ज्ञात नहीं। बस एक उम्मीद के पतले धागे में यह सफर हिचकोले खा रहा है। बस जरूरत है इस धागे को एक सुन्दर कलाकृति का रूप देने की। अभी भी यही एक तरफ़ा आकर्षण की क्रिया चल रही है।

कभी देखा है आकाश से परियों को उतारकर धरा की भूमि को पवित्र करते हुए !

मैंने देखा है ! शायद उस दिवस धरती की वह मिट्टी पावन हुई हो या नहीं परन्तु मेरे ह्रदय की जमीन तृप्त अवश्य जरूर हो गयी थी।

अब ग्रीष्म ऋतु का आगमन हो चुका है।

उस दिन जब वह हलके नीले वस्त्र में, अपने मुखपृष्ठ को ढककर प्रकट हुई तो लगा वह नीले वस्त्र की शीतलता, मेरे अंदर उबलती उस गर्मी के असर को सोखती जा रही हो।

फिर वह घटना भी घटित हुई जिसका मुझे कभी भान ही नहीं था !

इस बगीचे में उस पुष्प के सुंदरता के पीछे केवल मदमुक्त एक भंवरा मैं ही हूँ - यह सोच गलत सिद्ध हुई !
एक भवंरा और था जो इस कली के पीछे आकर्षित था। और हो भी क्यों न ? कली की सुंदरता इतनी मनमोहक है की एक निर्जीव वस्तु भी उसपर अपने प्राण न्योछावर कर दे।

फिर अचानक एक दिन एक विचित्र विचार ने मन को घेर लिया।

यह आकर्षण, यह मनमोहकता केवल मन का एक भ्रम है। एक काया को देखकर अधोलिखित विचार का ह्रदय में आना स्वाभाविक ही है। आप जितना उसके बारे में सोचते हो, आप उस भावना के चक्रव्यू में और फसते जाते हो। केवल उसका विचार मन को घेरे रहता है। कार्य और अध्यन से आपका मन स्थान्तरित होने लगता है।
यह सब आपके यौवनावस्था का कारण उत्कर्षित आकर्षण और कसूर है, आप इसे नजरअंदाज नहीं कर सकते परन्तु बाहर निकलने में अपना योगदान दे सकते हैं।

अतः अब आलम यह है,
इंतजार रहता है उसका परन्तु इंतजार नहीं करता मैं।
नेत्र उसको ढूंढते हैं परन्तु विवशता में नहीं।
आकर्षण अभी भी है परन्तु आकर्षित नहीं हूँ।

आगे देखेंगे क्या परिणाम निकलता है।

(अतिथि लेखक)

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