Time & Music - समय के साथ बदलती संगीत की दुनिया !
संगीत !
केवल इस शब्द के नाम उच्चारण से ही मन में कईं ध्वनियाँ खनखनाने लगती है। संगीत के कईं प्रकार हैं। विश्व में हर स्थान में संगीत के अपने अलग धुन, बोल और अर्थ हैं। संगीत भी परिस्थितियों और उम्र के अनुसार अलग अलग प्रकार से सुने जाते हैं। ख़ुशी, गम, उल्लास, प्रेम, देश प्रेम और न जाने क्या क्या।
तो चलिए आज बात करते हैं परिस्थितियों और उम्र के अनुसार बदलते संगीत क्रिया को।
इस भाग में हम केवल उम्र के अनुसार संगीत के बदलते स्वरुप का विश्लेषण करेंगे।

1. बाल्यवस्था:- (0 - 12 वर्ष का समय) - यह वह समय होता है जब आप केवल धुन को सुनकर थिरकना शुरू करते हैं, अर्थ की समझ नहीं होती। हम संगीत के प्रति प्रतिक्रिया करना पैदा होते ही शुरू करने लगते है जैसे हल्की सी मुस्कान का चेहरे पे आ जाना, आँख बंद करके केवल धुन को सुनना इत्यादि। बच्चे यदि दो बार भी किसी संगीत को सुन लेते हैं तो तोतले अंदाज में उसे गुनगुनाते रहते है। फिर वही गाना रिश्तेदारों के गाने को कहने पर सुनाई देता है। बच्चों को बोल से कोई मतलब नहीं रहता वे तो केवल वो सुनना चाहते हैं जिसमे 2 मिनट के लिए कमर मटकाया जा सके। ऐसा नहीं है की उन्हें संगीत याद नहीं रहते, हमसे ज्यादा उन्हें वो धुन याद रह जाते हैं। दूर पडोसी के घर में भी यदि वो संगीत बजे तो वो घर में ही नाचना शुरू कर देते है। जन्मदिन जैसे मौकों में गाये जाने वाले संगीत के बोल उन्हें हमेशा याद रहते हैं। वो उन्हें कभी नहीं भूल पाते।
निष्कर्ष यह निकलता हैं कि:- वे केवल एक क्षणिक ख़ुशी को संगीत की धुन के साथ आनंद लेने की क्रिया के पात्र हैं।
2. यौवनावस्था:- (13 से 22 तक की अवस्था) - अब समय आता है शब्दों के बोल के समझने और परिस्थितियों के अनुसार ढालने की। यह वो समय है जब धूम धड़ाके रुपी संगीत के शब्द कान को अच्छे लगने लगते हैं। नए नए गानों की श्रेणी आपके फ़ोन और लैपटॉप में दिखाई देने लगती हैं। यह समय होता है किसी विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण का। उस काया प्रति आकर्षण आपको प्रेम संगीत सुनने को मजबूर करता हैं। आप अपने प्रिय संगीत को आँख बंद करके सुनने लगते हैं और मन में उस काय की कल्पना करते हैं जिसकी याद में आप वो संगीत सुन रहे हैं। अपने प्रिय संगीत में स्वयं को नायक और अपनी चाहत को नायिका के रूप के चित्रित करने लगते हैं आप। यह एक ऐसा समय होता है जब आपके संगीत के बोल आपकी जीवन में घट रही परिस्थिति के अनुसार चयनित होते हैं। साथ ही यह समय होता है जब आपको एक संगीत अति प्रिय होता है तो कुछ समय उसे आप लगातार सुनने लगते हैं, शुरू में तो यह गुड की तरह मीठा लगने लगता है परन्तु एक क्षण आता है जब वही संगीत आपको करेले की भाँती लगने लगता है। इसलिए कहा गया है - किसी भी चीज की अती हानिकारक होती है।
यौवनावस्था समय ऐसा समय है जब आप मौज मस्ती और आनंद में लगे रहते है या पढाई की चिंता के डूबकी लगा रहे होते हैं। आपके संगीत के बोल भी इसी के अनुसार बदलते रहते हैं। कहीं भी कोई संगीत बज रहा हो तो आप अपने पसंदीदा संगीत को चलाने में आतुर रहते है। आप जब वह संगीत चलाते हैं तो आप सोचते है की सबको वह अच्छा लगेगा क्यूंकि वह आपका पसंदीदा होता है। आप थिरकने लगते है।
यह वही समय है जब टेलीविज़न में कार्टून की मात्रा काम होने लगती हैं और संगीत के चैनल ज्यादा बजने लगते हैं।
अब यहाँ आते है जो किसी अन्य भाषा के संगीत सुनने में ज्यादा रूचि रखते हैं। यह वो होते हैं जिन्हे संगीत के बोल समझ आये या नहीं परन्तु सुनते जरूर हैं क्यूंकि उसकी धुन अच्छी लगती है। उदहारण ले सकते है आप इस संगीत का:- Click Here !

3. कार्येकाल (व्यावसायिक) अवस्था - अब समय आता है एक उल्लास पूर्ण जीवन के अंत और व्यावसायिक जीवन में कदम रखने की। सुबह दफ्तर जाते समय संगीत, खाली समय में संगीत, दफ्तर में दोपहर के भोजन पश्चात संगीत, शाम को घर जाते समय सुनने वाले संगीत और न जाने कहाँ कहाँ। अब समय आता है नींद के उड़ने की तो इस समय संगीत की धुन ही चैन की नींद में ले जाने में मदद करती हैं। अब वो धूम धड़ाके रुपी संगीत पसंद नहीं आते। अब धुन नहीं बोल में ध्यान अधिक जाता है। संगीत के बोल हमारी वास्तविक जीवन का परिचय दे जाती है। अब केवल धूम धड़ाके रुपी संगीत पार्टी में ही सुनने को मिलते है क्यूंकि वहाँ भी मजबूरी है कि आप अपना संगीत नहीं सुना सकते नहीं तो सब सो न जाएँ।
परन्तु इस उम्र के दौरान संगीत आपके मनोबल को और उत्साह को बनाये रखता है। आपके अंदर एक बन जागृत करता है जो न जाने कहाँ गायब हो गया था।
4. वैवाहिक अवस्था - अब आप कदम रखते है वैवाहिक अवस्था में। शुरू शुरू में तो सब मीठा मीठा लगने लगता है परन्तु आप संगीत के प्रति रूचि खोने लगते हैं परन्तु जब वैवाहिक जीवन में परेशानियां बढ़ने लगती है तो आप फिर से उठा लेते है अपने फ़ोन और ईयरफ़ोन को और शुरू हो जाते है उस परेशानी के बादल को हटाने की। संगीत, हल्की उत्साह रुपी वर्षा करता हैं उस बंजर और नीरस जीवन रुपी जमीन में। अब कभी कभी वो पुराने यौवनरूपी जीवन के संगीत धुन गलती से सुनाई देने पर दिल में अजीब सी भावना जागृत हो जाती है। धीरे धीरे वो सभी चेहरे सामने मंडराने लगते हैं जो कभी आपको प्रिय थे - आपके मित्र - जो अब कहीं किसी अन्य ग्रह में गुम हो चुके हैं। ख़ुशी, मुख में मुस्कान के रूप में उतर आती हैं और ह्रदय की स्पंदन गति बढ़ने लगती है। एक पुराने संगीत की ध्वनि आपके समक्ष पूरी यौवनावस्था लेकर आ जाती है। आप आशा करते हैं की वो पल दोबारा आ जाते परन्तु जाने वाले का नियम कभी नहीं बदलता। वैवाहिक जीवन के यह क्षण अब जिए नहीं अपितु काटे जाने लगते हैं।
परन्तु संगीत अब बच्चों की किलकारियों के रूप में जागृत हो जाती है। नीरस जीवन के एक आशा की किरण दिखाई देती है। अपने बच्चों के साथ संगीत को सुनने का आनंद अपार होता है। अब नए मित्र बनने लगते है। उनके साथ घर में झूठ बोलकर घूमने जाते समय कार के बज रहा संगीत एक अलग ही आनंद दे जाता है। अब संगीत मोबाइल में नहीं अपितु आपको दूसरों की ख़ुशी में, परिवार की ख़ुशी में, माता पिता की ख़ुशी में, बच्चों की किलकारियों में, अर्धांगिनी की मुस्कान में, नए मित्रों की साथ में झलकनी लगती हैं।

5. वृद्धावस्था - वह समय जब संगीत का उपयोग केवल भगवान् और भक्ति के सागर में डूबने के लिए किया जाता है। अब न तो कान धूम धड़ाके वाली और प्रेम रुपी संगीत सुनने को तैयार हैं और न ही मन। 50 वर्ष पहले यौवनावस्था में सुने गए गीत भी अब शोर लगने लगते हैं। परन्तु ऐसे गीत जो आपके दिल से जुड़े हैं और जिसमे संगीत के बोल मन को छू जाते हैं वो संगीत ही दिलो दिमाग में बसे रहते हैं। अब तो केवल ईश्वर की महिमा सुनने का मन करता है या पुराने संगीत जैसे की किशोर कुमार, आर डी वर्मन आदि। क्या पता आने वाली पीढ़ी अरिजीत सिंह, अरमान मालिक, जुबिन नौटियाल आदि को सुनने में रूचि रखे।
समय जो भी आ जाए, संगीत के प्रति रूचि कभी कम नहीं होगी। नया जमाना आएगा और संगीत के धुन में भी बदलाव होगा जो अनुकूलता को बनाये रखेगा।
सलाह - यदि कभी भी मन विचलित हो, दुखी हों आप या घर वालों से नाराज अथवा प्रेमिका के बिछोड का गम हो तो उठाओ अपना फ़ोन + ईरफ़ोन और निकल जाओ बस स्टॉप की तरफ। बस पकड़ो, 10 रूपए की टिकट लो, ध्यान रखना खिड़की वाली सीट में ही बैठना, अपने फ़ोन में गाने लगाओ और उसी बस में आधा घंटा सफर करके वापस लौट आओ क्यूंकि उदासी में तुम कुछ उखाड़ने वाले भी नहीं हो इसलिए चित्त प्रसन्न करने का यह रामवाण इलाज़ ही अपना लो और क्या पता 1 घंटे का वो सफर कुछ हिम्मत दे जाए उदासी ने उबरने में।
यह नुस्खा स्वयं उपयोग करके बताया गया है और 100 प्रतिशत कारगार है। भ्रम हो तो एक बार आज़मा के देख सकते हो।
इसी के साथ विदा लेते है।

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